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Tuesday, 30 May 2017

किस तरह भुलाऊँ उनको

ऐ दिल बता किस तरह भुलाऊँ उनको
फोडूँ शीशा ए दिल न नज़र आऊँ उनको

काँटें लिपटे मुरझाते नहीं गुलाब यादों के
तन्हा बाग में रो रोके गले लगाऊँ उनको

दूर तलक हर सिम्त परछाईयाँ नुमाया है
कैसे मैं बात करूँ कहाँ से लाऊँ उनको

जबसे भूले वो रस्ता मेरा दर सूना बहुत
तरकीब बता न कैसे याद दिलाऊँ उनको

दिल के खज़ाने की पूँजी है चाहत उनकी
किस तरह खो दूँ मैं कैसे गवाऊँ उनको

       #श्वेता🍁

Friday, 26 May 2017

तुम्हारा स्पर्श


मेरे आँगन से बहुत दूर
पर्वतों के पीछे छुपे रहते थे
नेह के भरे भरे बादल
तुम्हारे स्नेहिल स्पर्श पाकर
मन की बंजर प्यासी भूमि पर
बरसने लगे है बूँद बूँद
रिमझिम फुहार बनकर
अंकुरित हो रहे है
बरसों से सूखे उपेक्षित पड़े
इच्छाओं के कोमल बीज
तुम्हारे मौन स्पर्श की
मुस्कुराहट से
खिलने लगी पत्रहीन
निर्विकार ,भावहीन
दग्ध वृक्षों के शाखाओं पे
 गुलमोहर के रक्तिम पुष्प
भरने लगे है रिक्त आँचल
इन्द्रधनुषी रंगों के फूलों से
तुम्हारे शब्दों के स्पर्श
तन में छाने लगे है बनकर
चम्पा की भीनी सुगंध
लिपटने लगे है शब्द तुम्हारे
महकती जूही की लताओं सी
तुम्हारे एहसास के स्पर्श से
मुदित हृदय के सोये भाव
कसमसाने लगे है आकुल हो
गुनगुनाने लगे है गीत तुम्हारे
बर्फ से जमे प्रण मन के
तुम्हारे तपिश के स्पर्श में
गलने लगे है कतरा कतरा
हिय बहने को आतुर है
प्रेम की सरिता में अविरल
देह से परे मन के मौन की
स्वप्निल कल्पनाओं में
       
        #श्वेता🍁

समेटे कैसे

सुर्ख गुलाब की खुशबू,हथेलियों में समेटे कैसे
झर रही है ख्वाहिशे संदीली,दामन में समेटे कैसे

गुज़र जाते हो ज़ेहन की गली से बन ख्याल आवारा
एहसास के उन लम्हों को, रोक ले वक्त समेटे कैसे

रातों को ख्वाब के मयखाने में मिलते हो तुम अक्सर
भोर की पलकों से फिसलती, खुमारी को समेटे कैसे

काँटें लफ्ज़ों के चुभ जाते है आईना ए हकीकत में
टूटे दिल के टुकड़ों का दर्द,झूठी मुस्कां में समेटे कैसे

तेरे बिन पतझड़ है दिल का हर एक मौसम सुन लो
तेरे आहट की बहारों को,उलझी साँसों में समेटे कैसे
          #श्वेता🍁

Wednesday, 24 May 2017

तुम्हारी तरह

गुनगुना रही है हवा तुम्हारी तरह
मुस्कुरा रहे है गुलाब तुम्हारी तरह

ढल रही शाम छू रही हवाएँ तन
जगा रही है तमन्ना तुम्हारी तरह

हंस के मिलना तेरा मुस्कुराना
तेरी बातें सताती है तुम्हारी तरह

लफ्जो़ं  अपनी धड़कन को छूना
बहुत याद आती है तुम्हारी तरह

कहानी लिखूँ या कविता कोई मैं
गज़ल बन रही है तुम्हारी तरह

न तुम सा कोई और प्यारा लगे है
नशा कोई तारी है तुम्हारी तरह

   #श्वेता🍁


Sunday, 21 May 2017

आकाश झील

दिन भर की थकी किरणें
नीले आकाश झील के
सपनीले आगोश से
लिपटकर सो जाती है
स्याह झील के आँगन में
हवा के नाव पर सवार
बादल सैर को निकलते है
असंख्य ख्वाहिशों की कुमुदनी
में खिले सितारों की झालर
झील के पानी में जगमगाते है
शांत झील के एक कोने में
श्वेत दुशाला डाले तन्हा चाँद
आधा कभी पूरा मुख दिखलाता
जाने किस सोच में गुम उदास
निःशब्द बर्फ के शिलाखंड से
बूँद बूँद चाँदनी पिघला कर
मन को उजास की बारिश में
भिंगोकर शीतल करता है
निर्मल विस्तृत आकाश झील
हृदय के जलती बेचैनियों को
अपने सम्मोहन में बाँधकर
खींच लेता है अपनी ओर
और पलकों में भरकर स्वप्न
समा लेता है अपने गहरे संसार में।

    #श्वेता🍁




क्यों खास हो

नासमझ मन कुछ न समझे
कौन हो तुम क्यों खास हो

बनती बिगड़ती आस हो
अनकही अभिलाष हो
हृदय जिससे स्पंदित है
तुम वो सुगंधित श्वास हो
छूटती जीवन डोर की
तुम प्रीत का विश्वास हो

क्या हो कह दो खुद ही तुम
धड़कनों में क्यों खास हो

आधे अधूरे मन की वेदना
मौन में गूँजित हो साधना
न मिलो न पास हो पर,
ख्वाब तुम, तुम ही कल्पना
हर मोड़ पर जीवन के
तुमसे ही मिलती है प्रेरणा
अवनि से अंबर तक फैले
स्नेहिल भाव का आकाश हो

मेरे ख्यालों से न जाना तेरा
तन्हाईयों में तुम क्यों खास हो

मेरे रुप का अभिमान तुम
झुकी पलकों का सम्मान तुम
बड़े जतन से सँभाले रखा है
दिल के कोरे पन्नों पे नाम तुम
तुम हो जब तक चल रही है
धड़कते हो जीवन प्राण तुम
मिटती नहीं जितना भी बरसे
आकुल हृदय की प्यास तुम

तुम्हे महसूस कर इतराऊँ मैं
बता न तुम इतने क्यों खास हो

          #श्वेता🍁


मेरा मन

ये दर्द कसक दीवानापन
ये उलझा बिगड़ा तरसता मन
दुनिया से उकताकर के भागा
तेरे पहलू में आ सुस्ताता मन
दो पल को तुम मेरे साथ रहो
तन्हाई में तड़पता प्यासा मन
तेरी एक नज़र को बेकल
पल पल कितना अकुलाता मन
नज़रे तो दर न ओझल हो
तेरी आहट पल पल टोहता मन
खुद से बातें कभी शीशे से
तुझपे मोहित तुझे पाता मन
तेरी तलब तुझसे ही सुकून
हद में रह हद से निकलता मन
दुनिया के शोर से अंजाना
बस तुझसे ही बातें करता मन
बेरूख तेरे रूख से आहत
रूठा रूठा कुम्हलाता मन
चाहकर भी चाहत कम न हो
बस तुझको ही पागल चाहता मन

        #श्वेता🍁



सूरज

उनींदी पलकों को खोलकर देखे
भोर से मिलता अलसाता सूरज

घटाओं के झुरमुट से झाँककर
स्मित मुस्कान बिखराता सूरज

पर्वतशिख के बाहुपाश में बँध
सुधबुध सर्वस्व बिसराता सूरज

मस्त पवन के अमृत प्याले पीकर
हर फूल कली को रिझाता सूरज

चूमकर धरा की धानी चुनरिया
लता वन कानन दुलराता सूरज

नदी तड़ाग का जल सोना करके
सागर में छककर नहाता सूरज

नियत समय पर मिलने है आता
दिनभर कितना बतियाता सूरज

बादल से आँख मिचौली खेलता
रूप बदलकर दिखलाता सूरज

सप्त अश्व रथ में बैठकर चलता
सुबह और शाम बतलाता सूरज

        #श्वेता🍁

Thursday, 11 May 2017

बेबसी


ऊफ्फ्...कितनी तेज धूप है.....बड़बड़ाती दुपट्टे से पसीना पोंछती मैं शॉप से बाहर आ गयी।इतनी झुलसाती गरमी में घर से बाहर निकलने का शौक नहीं था....मजबूरीवश निकलना पड़ा था....
माँ की जरूरी दवा खत्म हो गयी थी इसलिए आना जरूरी था।
सुनसान दोपहर में वीरान सड़को को जलाती धूप और शरीर की हड्डी तक गला डाले ऐसी लू चल रही ।मेरे शहर का पारा वैसे भी अपेक्षाकृत चढ़ा ही रहता है।
   तेजी से कदम बढ़ाती सोच ही रही थी कोई रिक्शा या ऑटो मिल जाता....तभी मेरे सामने आकर ऑटो रूकी। ओहह ये तो मेरे ही एरिया के ऑटो वाले भैय्या थे।मैं मन ही राहत महसूस करती बैठ गयी।गली से थोड़ी दूर मेन रोड पर उन्होनें उतार दिया,उनका मकान दूसरी तरफ बस्ती में था।
      मन ही मन सोचती अभी घर जाकर आराम से ए.सी चलाकर फ्रिज से लस्सी निकालकर बैठेगे।अभी चार कदम चली ही थी कि
रोने आवाज़ सुनी....मैं चौंक कर देखने लगी अभी कौन ऐसे रो रहा....देखा तो वही एक चार मंजिला फ्लैट के नीचे कोने में खड़ी एक लड़की सुबक सुबक कर रो रही है।
पहले तो मैंने अनदेखा किया और आगे बढ़ गयी पर फिर रहा न गया वापस आई चुपचाप उसके पास खडी हो गयी।वो लगातार रोये जा रही थी।छः- सात साल की लड़की थी वो,घुटने तक सफेद फूलों वाली फ्रॉक पहने...जो मटमैले से हो रहे थे...पीठ की तरफ चेन खराब हो गयी थी....इसलिए उघड़ी हुयी थी आधी पीठ तक....
बिखरे भूरे पसीने से लथपथ बाल मुँह पे झूल रहे थे जिसे वो बार बार हटा रही थी....जलती धरती पर सहज रूप पर नंगे पाँव खडी रोये जा रही थी। हाथों  की कसकर मुट्ठियाँ बाँधे कर सीने से लगाये हुए थी।
 मुझे खड़ा पाकर उसने एक क्षण को रोती लाल आँखों से मासूमियत भरकर मेरी ओर देखा और फिर सुबकने लगी।
मेरे पास पानी की बोतल थी जो अब मौसम की तरह गरम हो गयी थी।पर मैंने उससे कहा वो पी ले।उसने सिर न में हिलाया...
फिर मैंने पूछा,क्यों रो रही हो ।तीन चार बार पूछने पर जो कहा वो अन्तर्मन तक चुभ गया।
उसने कहा उसके बापू रिक्शा चलाते है आज पैसा मिला है न उधर से ही पीकर आये है....उन्हें एक पाउच दारु और चाहिए और एक बंडल बीड़ी भी....उन्होंने पैसे दिये है उसे ये सब लाने को....उसने मना किया तो बहुत मारा और बाहर निकाल दिया घर से.....।।कहा जब तक दारु नहीं लाना घर मत आना...।लेकिन वो दारु के ठेके में जाना नहीं चाहती क्योंकि वहाँ भोला है न वो उसको तंग करता है।
उसकी फ्रॉक खींचता है....गालों पर चुटकी काटता है और वो ऐसा करने को मना करती है तो दो चार चाँटे भी लगा देता है। उसकी बात सुनकर मैं सुन्न पड़ गयी।समझ नहीं आया क्या कहूँ....किसे समझाऊँ......उस मासूम को ,उसके शराबी पिता को,ठेके वाले भोला को किसे कहूँ.....मन में विचारों का बबंडर लिये थके कदमों से वापस लौट आयी घर ।

       #श्वेता🍁

Wednesday, 10 May 2017

कभी यूँ भी तो हो

कभी यूँ भी तो हो....

साँझ की मुँडेर पे चुपचाप
तेरे गीत गुनगुनाते हुए
बंद कर पलको की चिलमन को
एहसास की चादर ओढ़
तेरे ख्याल में खो जाये
हवा के झोंके से तन सिहरे
जुल्फें मेरी खुलकर बिखरे
तस्व्वुर में अक्स तेरा हो
और ख्यालों से निकल कर
सामने तुम आओ

कभी यूँ भी तो हो.....

बरसती हो चाँदनी तन्हा रात में
हाथों में हाथ थामे बैठे हम
सारी रात चाँद के आँगन में
साँसों की गरमाहट से
सितारें पिघलकर टपके
फूलों की पंखुडियाँ जगमगाये
आँखों में खोये रहे हम
न होश रहे कुछ भी
और ख्वाब सारे उस पल में
सच हो जाए

कभी यूँ भी तो हो...

     #श्वेता🍁

ख्याल आपके

ख्वाहिश जैसे ही ख्याल आपके
आँखें पूछे लाखों सवाल आपके

अब तक खुशबू से महक रहे है
फूल बन गये है रूमाल आपके

सुरुर बन चढ़ गये जेहन के जीने
काश कि न उतरे जमाल आपके

कर गये घायल लफ्जो से छु्कर
मन को भा रहे है कमाल आपके

दिल कि जिद है धड़कना छोड़ दे
न हो जिस पल में ख्याल आपके


#श्वेता🍁

Tuesday, 9 May 2017

ख्वाब

खामोश रात के दामन में,
जब झील में पेड़ों के साये,
गहरी नींद में सो जाते है
उदास झील को दर्पण बना
चाँद मुस्कुराता होगा,
सितारों जड़ी चाँदनी की
झिलमिलाती चुनरी ओढ़कर
डबडबाती झील की आँखों में
मोतियों सा बिखर जाता होगा
पहर पहर रात को करवट
बदलती देख कर दिल
आसमां का धड़क जाता होगा
दूर अपने आँगन मे बैठा
मेरे.ख्यालों में डूबा वो
हथेलियों में रखकर चाँद
आँखों में भरकर मुहब्बत
मेरे ख्वाब सजाता तो होगा।

      #श्वेता🍁

तितलियाँ

रंगीन ख्वाबों सी आँख में भरी तितलियाँ
ओस की बूँदों सी पत्तों पे ठहरी तितलियाँ

गुनगुनाने लगा दिल बन गया चमन कोई
गुल  के पराग लबों पे बिखरी तितलियाँ

बादलों के शजर में रंग भरने को आतुर
इन्द्रधनुष के शाखों पे मखमली तितलियाँ

बचपना दिल का लौट आता है उस पल
हौले से छूये गुलाबों की कली तितलियाँ

उदास मन के अंधेरों में उजाला है भरती
दिल की मासूम कहानी की परी तितलियाँ

मन के आसमाँ पर बेरोक फिरती रहती
आवारा है ख्यालों की मनचली तितलियाँ

         #श्वेता🍁


Monday, 8 May 2017

मिराज़ सा छलना

सुबह का चलकर शाम में ढलना
जीवन का हर दिन जिस्म बदलना

हसरतों की रेत पे दर्या उम्मीद की
खुशी की चाह में मिराज़ सा छलना

चुभते हो काँटें ही काँटे तो फिर भी
जारी है गुल पे तितली का मचलना

वक्त के हाथों से ज़िदगी फिसलती है
नामुमकिन इकपल भी उम्र का टलना

अंधेरे नहीं होते हमसफर ज़िदगी में
सफर के लिये तय सूरज का निकलना

      #श्वेता🍁

Saturday, 6 May 2017

कुछ पल सुकून के


      गहमा-गहमी ,भागम भाग अचानक से थम गयी जैसे....घड़ी की सूईयों पर टिकी भोर की भागदौड़....सबको हड़बड़ी होती है...अपने गंतव्य पर समय पर पहुँचने की...सबके जाने के बाद...घर की चुप्पी को करीने  सहेजती....
भोर के इस पल का रोज बेसब्री से इंतज़ार होता है मुझे....
चाय चढ़ाकर रसोई की खिड़की के बाहर नजरें चली जाती है हमेशा....जहाँ से दिखाई पड़ता है विशाल पीपल का पेड़...जब से इस घर आई हूँ फुरसत के पल उस पेड़ को ताकने में बीत जाता है....नन्हें नन्हें चिड़ियों की भरमार है उसपर....सुबह से ही.तरह तरह की आवाजें निकालते...किलकते,फुदकते एक दूसरे से जाने किस भाषा में बतियाते....मधुर गीत गाते मानो गायन प्रतियोगिता होती है हर सुबह... आजकल तो कोयल भोर के प्रथम प्रहर से ही रियाज़ शुरू कर देती है....इस डाली से उस डाली, हरे पत्तों से आँखमिचौली खेलते.....नाचते आपस में खेलते पक्षी बहुत सुकून देते है मन को.....खिड़की के बाहर निकले मार्बल पर जरा सा चावल ,रोटी के कुछ महीन टुकड़े रख देती हूँ जब मैंना और गौरेया रसोई की खिड़की पर आकर स्नेह से देखते है एक एक दाना खाते सारे जहान की बातें कहते है मुझसे फिर इक असीम आनन्द की लहर से मन में दौड़ने लगती है....जाने क्या क्या कहती है फुदक फुदक कर....मीठी बातों को सुनती उनके क्रिया कलाप को निहारने का यह सुख अद्भुत है।सबकुछ भूलकर उनके साथ बिताये ये पल एक अलग सुख दे जाते है......पुरवाई की हल्की थाप जैसे तन छूकर मन की सारी थकान मिटा देती है।
चाय के एक एक घूँट के साथ दुनिया से झमेले से परे अपने मौन का यह पल पूरे दिन की ताज़गी दे जाता है।


    #श्वेता🍁


7 a.m
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Thursday, 4 May 2017

तुम बिन

जलते दोपहर का मौन
अनायास ही उतर आया
भर गया कोना कोना
मन के शांत गलियारे का
कसकर बंद तो किये थे
दरवाज़े मन के,
फिर भी ये धूप अंदर तक
आकर जला रही है
एक नन्ही गौरेया सी
पीपल की छाँव से पृथक
घर के रोशनदान में
एक एक तिनके बटोर कर
छोटा सा आशियां बनाने
को मशगूल हो जैसे
जिद्दी और कही जाती ही नहीं,
उड़ के वापस आ जाती है
बस तुम्हारे ख्याल जैसे ही,
सोच के असंख्य उलझे
धागों में तुम्हारे ही अक्स
बार बार झटक तो रही हूँ
पर देखो न हर सिरा
तुम से शुरू होकर तुम पर
ही टिका हुआ है।
हर वो शब्द जो तुम कह गये
बार बार मन दुहरा रहा
मैं बाध्य तो नहीं तुम्हें सोचने को
पर तुम जैसे बाध्य कर रहे हो
मन का पंछी उड़कर कहीं
नहीं जा पा रहा,लौट रहा रह रह के
थक सी गयी विचारों के द्वंद्व से,
कुछ नहीं बदलता अन्तर्मन में
अनवरत विचार मग्न मन
अपना सुख जिसमें पाता
चाहो न चाहो बस वही सोचता है
सही-गलत ,सीमा- वर्जनाएँ
कहाँ मानता है मन का पंछी
तुम्हारे मौन से उद्वेलित,बेचैन
मन बहुत उदास है आज।

      #श्वेता🍁

Wednesday, 3 May 2017

सज़ा

दस्तूर  ज़माने की तोड़ने की सज़ा मिलती है
बेहद चाहने मे, तड़पने की उम्रभर दुआ मिलती है

ज़मी पर रहकर महताब को ताका नही करते
जला जाती है चाँदनी, जख्मों को न दवा मिलती है

किस यकीं से थामें रहे कोई यकीं की डोर बता
ख्वाब टूटकर चुभ जाए ,तो ज़िदगी लापता मिलती है

जिनका आशियां बिखरा हो उनका हाल क्या जानो
अश्कों के तिनके से बने ,मकां मे फिर जगह मिलती है

क्यों लौटे उस राह जिसकी परछाईयाँ भी अपनी नही
चंद खुशियों की चाहत में, तन्हाईयाँ बेपनाह मिलती है

        #श्वेता🍁



भावों में बहना छोड़ दे

पत्थरों के शहर में रहना है गर
आईना बनने का सपना छोड़ दे

बदल गये है काँटों के मायने अब
साथ फूलों के तू खिलना छोड़ दे

या खुदा दिल बना पत्थर का मिरा
चाहूँ कि भावों में बहना छोड़ दे

एक दिन मरना तो है सबको यहाँ
हर पल तू घुट के मरना छोड़ दे

आस्तीनों में पलते यहाँ नफरत बहुत
प्रेम के ढोंग पे खुद को छलना छोड़ दे

ख्वाब चाँद पाने का सच होता नहीं
जमीं देख तू आसमां पे चलना छोड़ दे

       #श्वेता🍁

Tuesday, 2 May 2017

शहीदों के लिए

कडी़ निंदा करने का अच्छा दस्तूर हो गया
कब समझोगे फिर से बेटा माँ से दूर हो गया

रोती बेवाओं का दर्द कोई न जान पाया
और वो पत्थरबाज देश में मशहूर हो गया

कागज़ पर बयानबाजी अब बंद भी करो तुम
माँगे है इंसाफ क्या वीरों का खूं फिजूल हो गया

सह रहे हो मुट्ठीभर भेड़ियों की मनमानी को
शेर ए हिंदुस्तान इतना कबसे मजबूर हो गया

दंड दो प्रतिशोध लो एक निर्णय तो अब कठोर लो
हुक्मरानों की नीति का हरजाना तो भरपूर हो गया

उपचार तो करना होगा इस दर्द बेहिसाब का
सीमा का जख्म पककर अब नासूर हो गया
 
         #श्वेता🍁


भोर.का सूरज

आसमान की अलगनी पे लटका
बादलों से नहाकर निकलता
नरम किरणों की बूँदे टपकाता
भोर का संजीवन लाता है सूरज

लुकाछिपी झुरमुटों से करता
चिड़ियों के परों पे उड़ता फिरता
नदियों के धारों के संग बहकर
समन्दर की लहरों में मचलता सूरज

धरा के कण कण को चूमता धूप से
बाग की कलियों को सहलाकर
पंखुड़ियों के रूख़सार पे ठहर के
नरम डालियों से लिपटता सूरज

लेकर उजाले की डिबिया हमेशा
भोर की पलकों पे सजाकर के जाता
रूत चाहे कोई हो नियत समय पर
खिड़की पे आके जगाता है सूरज

चाहे महल हो या हो झोपड़ी कोई
नहीं भेद करता कभी भी किसी से
उलट के किरणों से भरी टोकरी को
जग से अंधियारे को मिटाता है सूरज

       #श्वेता🍁

Monday, 1 May 2017

ख्वाहिशों का पंछी

बरसों से निर्विकार,
निर्निमेष,मौन अपने
पिंजरे की चारदीवारियों
में कैद, बेखबर रहा,
वो परिंदा अपने नीड़
में मशगूल भूल चुका था
उसके पास उड़ने को
सुंदर पंख भी है
खुले आसमां में टहलते
रुई से बादल को देख
शक्तिहीन परों को
पसारने का मन हो आया
मरी हुई नन्ही ख्वाहिशे
बुलाने लगी है पास
अनंत आसमां की गोद,
में भूलकर, काटकर
जाल बंधनों का ,उन्मुक्त
स्वछंद फिरने की चाहत
हो आयी है।
वो बैठकर बादलों की
शाखों पर तोड़ना
चाहता है सूरज की लाल
गुलाबी किरणें,देखना
चाहता है इंद्रधनुष के
रंगों को ,समेटना
चाहता है सितारों को,
अपने पलकों में
समाना चाहता है
चाँद के सपनीले ख्वाब
भरना चाहता है,
उदास रंगहीन मन में
हरे हरे विशाल वृक्षो़ के
चमकीले रंग,
पीना है क्षितिज से
मिलती नदी के निर्मल जल को
चूमना है गर्व से दिपदिपाते
पर्वतशिख को,
आकाश के आँगन में
अपने को पसारे
उड़ान चाहता है अपने मन
के सुख का,
नादां मन का मासूम पंछी
भला कभी तोड़ भी पायेगा
अपने नीड़ के रेशमी धागों का
सुंदर पिंजरा,
अशक्त पर, सिर्फ मन की उडान
ही भर सकते है,
बेजान परों में ताकत बची ही नहीं
वर्जनाओं को तोड़कर
अपना आसमां पाने की।

     #श्वेता🍁

मजदूर

मजदूर का नाम आते ही
एक छवि जेहन में बनती है
दो बलिष्ठ भुजा दो मजबूत पाँव
बस बिना चेहरे का एक धड़,
और एक पारंपरिक सोच,
बहुत मजबूत होता है एक मजदूर
कुछ भी असंभव नहीं
शारीरिक श्रम का कोई
भी काम सहज कर सकता है
यही सोचते हम सब,
हाड़ तोड़ मेहनत की मजदूरी
के लिए मालिकों की जी हुजूरी करते
पूरे दिन खून.पसीने बहाकर
चंद रुपयों की तनख्वाह
अपर्याप्त दिहाड़ी से संतुष्ट
जिससे साँसे खींचने भर
गुज़ारा होता है
उदास पत्नी बिलखते बच्चे
बूढ़े माता माता की बोझ ढ़ोते
जीने को मजबूर
एक जमीन को कई मंजिला
इमारतों में तब्दील करता
अनगिनत लोगों के ख्वाबों
का छत बनाता
मजदूर ,जिसके सिर पर
मौसम की मार से बचने को
टूटी छप्पर होती है
गली मुहल्ले शहरों को
क्लीन सिटी बनाते
गटर साफ करते,कड़कती धूप में
सड़कों पर चारकोल उड़ेलते,
कल कारखानों में हड्डियाँ गलाते
संकरे पाताल खदानों में
जान हथेलियों पर लिए
अनवरत काम करते मज़दूर
अपने जीवन के कैनवास पर
छेनी ,हथौड़ी,कुदाल,जेनी,तन्सला
से कठोर रंग भरते,
सुबह से साँझ तक झुलसाते है,
स्वयं को कठोर परिश्रम की
आग में,ताकि पककर मिल सके
दो सूखी रोटियों की दिहाड़ी
का असीम सुख।

        #श्वेता🍁