Monday, 10 April 2017

उम्मीद का दीया

जेहन की पगडंडियों पर चलकर
साँझ की थकी किरणों को चुनती
बुझते आसमां के फीके रंग समेट
दिल के दरवाजे पे दस्तक देती है
तन्हाई का हाथ थामें खड़ी मिलती
खामोश नम यादें आँखों में,
टूटते मोतियों को स्याह शाम के
बहाने से चेहरे पर दुपट्टा बिछाकर
करीने से हरएक मोती पोंछ लेती
फिर बुझते शाम के गलियारे में
रौशन टिमटिमाते यादों के हर लम्हे
सहेजकर ,समेटकर ,तहकर
वापस रख देती है सँभालकर फिर से,
चिराग दिल में उम्मीद का तेल भर देती
ताकि रौशन रहे दर तेरी यादों का
इस आस में कि कभी इस गली
भूले से आ जाए वक्त चलकर
दोहराने हर बात शबनमी शामों की
और वापस न लौट जाए कहीं
दर पे अँधेरा देखकर।
 
     #श्वेता🍁

पाँच लिंकों का आनन्द: 633...बात बनाने की रैसेपी या कहिये नुस्खा

पाँच लिंकों का आनन्द: 633...बात बनाने की रैसेपी या कहिये नुस्खा

Saturday, 8 April 2017

रोशनी की तलाश

रोशनी की तलाश
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मन का घना वन,
जिसके कई अंधेरे कोने से
मैं भी अपरिचित हूँ,
बहुत डर लगता है
तन्हाईयों के गहरे दलदल से,
जो खींच ले जाना चाहते है
अदृश्य संसार में,
समझ नहीं पाती कैसे मुक्त होऊँ
अचानक आ लिपटने वाली
यादों की कटीली बेलों से,
बर्बर, निर्दयी निराश जानवरों से
बचना चाहती हूँ मैं,
जो मन के सुंदर पक्षियों को
निगल लेता है बेदर्दी से,
थक गयी हूँ भटकते हुये
इस अंधेरे जंगल से,
भागी फिर हूँ तलाश में
रोशनी के जो राह दिखायेगा
फिर पा सकूँगी मेरे सुकून
से भरा विस्तृत आसमां,
अपने मनमुताबिक उड़ सकूँगी,
सपनीले चाँद सितारों से
धागा लेकर,
बुनूँगी रेशमी ख्वाब और
महकते फूलों के बाग में
ख्वाहिशों के हिंडोले में बैठ
पा सकूँगी वो गुलाब,
जो मेरे जीवन के दमघोंटू वन को,
बेचैनियों छटपटाहटों को,
खुशबूओं से भर दे।

                        #श्वेता🍁

Friday, 7 April 2017

व्यथा एक मन की

व्यथा एक मन की
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एक कमरा छोटा सा
एक बेड,उस पर
बिछे रंगीन चादर
आरामदायक कुशन
जिसपर काढ़े गये
गुलाब के ढेर सारे फूल
दो लकड़ी के
खूबसूरत अलमीरे
एक शीशा उस पर
बेतरतीब से बिखरे
कुछ प्रसाधन
कोने के छोटे मेज पर
सुंदर काँच के गुलदान
में रखे रजनीगंधा के फूल
और झरोखे में लटके
सरसराते रेशमी परदे
इस खूबसूरत सजे
निर्जीव कमरे की एक
सजीव सजावट हूँ मैं
किसी शो पीस की तरह
जिसकी इच्छा अनिच्छा
का मतलब नहीं शायद
तभी तो हर कोई
अपने मुताबिक सजा देता
अपने ख्वाहिशों के दीवार पर।

                #श्वेता🍁       

ज़िदगी

बहाना ढ़ूँढ़ लो तुम हँसने और हँसाने का
मुट्ठीभर साँसों को क्यों गम में गँवाने का

अगर मुमकिन नहीं आसमां में उड़ पाना
हौसला रखो फ़लक ही जमीं पर लाने का

हर फसल ख्वाब की तैयार हो जरूरी नहीं
बोना न भूलो नये ख्वाब जरुर सच होने का

इस ज़िदगी के कारोबार को समझना मुश्किल
एक आँख में पाने की खुशी दूजे में रंज खोने का

टूटकर चकनाचूर होता दिल किसी बहाने से
न बनाओ अपनी खुशी काँच के खिलौने का

      #श्वेता🍁

Thursday, 6 April 2017

साँझ के किनारे

किसी साँझ के किनारे
पलकें मूँदती हौले से
आसमां से उतरकर
पेडों से शाखों से होकर
पत्तों का नोकों से फिसलकर
खामोश झील के
दूर तक पसरे सतह पर
कतरा कतरा पिघलकर
गुलाबी रंग घोल देती है
रंगहीन मन के दरवाजे पर
दस्तक देती साँझ
स्याह आँगन में
जलते बुझते टिमटिमाते
सपनीली ख्वाहिशों के सितारे
मौन वेदना लिए निःशब्द
प्रतीक्षारत से वृक्ष
जो अक्सर बेचैन करते है
गुलाबी झील में गुम हुई
परछाईयों में यादों को
ढूँढता है मन संवेदनाओं में
लिपटे गुजरे कुछ पल
उस उदास झील के
तन्हा गुलाबी किनारे पर

          #श्वेता🍁


Tuesday, 4 April 2017

तहरीरैं बेजुबान

दिन आजकल धूप से परेशान मिलती है,
साँवली शाम ऊँघती बहुत हैरान मिलती है।

रात के दामन पर सलवटें कम ही पड़ती है ,
टोहती चाँदनी से अजनबी पहचान मिलती है।

स्याह आसमां पर सितारे नज़्म बुनते है जब,
चाँद की वादियों में तहरीरें बेजुबान मिलती है।

दिल भटकता है जिन ख्वाहिशों के जंगल  में,
ठूँठ झाड़ियों में लटकी हसरतें वीरान मिलती है।

अधजले चाँद के टुकड़े में लिपटे अनमने बादल,
जलती बेचैनियों से रात भी शमशान मिलती है।

           #श्वेता🍁

सुरमई अंजन लगा

सुरमई अंजन लगा निकली निशा। चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।। सेज तारों की सजाकर  चाँद बैठा पाश में, सोमघट ताके नयन भी निसृत सुधा...