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Thursday, 6 April 2017

साँझ के किनारे

किसी साँझ के किनारे
पलकें मूँदती हौले से
आसमां से उतरकर
पेडों से शाखों से होकर
पत्तों का नोकों से फिसलकर
खामोश झील के
दूर तक पसरे सतह पर
कतरा कतरा पिघलकर
गुलाबी रंग घोल देती है
रंगहीन मन के दरवाजे पर
दस्तक देती साँझ
स्याह आँगन में
जलते बुझते टिमटिमाते
सपनीली ख्वाहिशों के सितारे
मौन वेदना लिए निःशब्द
प्रतीक्षारत से वृक्ष
जो अक्सर बेचैन करते है
गुलाबी झील में गुम हुई
परछाईयों में यादों को
ढूँढता है मन संवेदनाओं में
लिपटे गुजरे कुछ पल
उस उदास झील के
तन्हा गुलाबी किनारे पर

          #श्वेता🍁