Tuesday, 25 April 2017

कहाँ छुपा है चाँद

साँझ से देहरी पर बैठी
रस्ता देखे चाँद का
एक एक कर तारे आये
न दीखे क्यूँ चंदा जाने
क्या अटका है पर्वत पीछे
या लटका पीपल नीचे
बादल के परदे से न झाँके
किससे पूछूँ पता मैं
मेरे सलोने चाँद का

अबंर मौन बतलाता नहीं
लेकर संदेशा भी आता नहीं
कौन देश तेरा ठौर न जानूँ
मैं तो बस तुझे दिल से मानूँ
क्यों रूठा तू बता न हमसे
बेकल मन बेचैन नयन है
भर भर आये अब पलकें भी
बोझिल मन उदास हो ढूँढें
दीखे न निशां मेरे चाँद का

          #श्वेता🍁

प्यासा मन

बैशाख की बेचैन दुपहरी से
दग्ध धरा की अकुलाहट,
सुनसान सड़कों पर
चिलचिलाती धूप के गहरे निशां,
सिकुड़े त्रस्त विशाल वृक्ष
चुभते तिनकों के नीड़ में
बेबस हुए निरीह खग वृंद,
झुलसे हुए फूलों की क्यारी
तन को भस्म करने को लिपटती
गरम थपेड़़ो की बर्बरता,
खिडकी दरवाजें को
जबर्दस्ती धकेलकर
घर को जलाने को आतुर
लू की दादागिरी,
और हृदय की
अकुलाहट बढ़ाता
बाहर के मौसम की तरह
तुम्हारा मौन,
उदास निढाल पडा़ मन
साँझ होने की
प्रतीक्षा में है,
जब सूरज थक कर
अंबर की की गोद में
सो जायेगा,
तुम आओगे फिर
रजनीगंधा से महकते
तुम्हारे लफ़्जों की सौगात लिए,
जिसके कोमल स्पर्श
को ओढ़कर मुस्कुराती
भूल जाऊँगी झुलसाती दुपहरी
तुम बरसा जाना कुछ बूँदें नेह की,
और मैं समा लूँगी हर शब्द
 अंतर्मन में ,प्यासी धरा सी।


        #श्वेता🍁

श्वेत श्याम मनोभाव

आत्म मंथन के क्षण में
विचारों के विशाल वन में,
दो भाग में बँटा मन पाया
चाहकर भी जुट नहीं पाया,
एक धरा से  पड़ा मिला
दूजा आसमां में उड़ा मिला,
एक काजल सा तम मन
दूजा जलता कपूर सम मन,
कभी भाव धूल में पड़े मिले
कभी राह में फूल भरे मिले,
गर्व का आईना चूर हो गया
जब मेरा मैं मुझसे दूर हो गया,
जीवन के चलचित्र के धागे
पलकों पे हर दृश्य है भागे,
काले उजले कर्म के दोधारों में
हम सब नित नये नये किरदारों में,
अदृश्य सूत्रधार छिपा है गगन में
बदल रहा पट क्षण प्रतिक्षण मे,
जीवन भर का सार ये जाना है
बँटे मन का भार अब पहचाना है,
दो रंगों के बिसात पर खेल रचे है
मन के भाव ही मोहरे बन ते है
वक्त के पासे की मरजी से चलकर
जीवन का अंत पाना है।

         #श्वेता🍁

Monday, 24 April 2017

तुम ही तुम हो

मुस्कुराते हुये ख्वाब है आँखों में
महकते हुये गुलाब है आँखों में

बूँद बूँद उतर रहा है मन आँगन
एक कतरा माहताब  है  आँखों में

उनकी बातें,उनका ही ख्याल बस
रोमानियत भरी किताब है आँखों में

जिसे पीकर भी समन्दर प्यासा है
छलकता दरिया ए आब है आँखों में

लम्हा लम्हा बढ़ती बेताबी दिल की
खुमारियों का सैलाब है आँखों में

लफ्जों की सीढ़ी से दिल में दाखिल
अनकहे सवालों के जवाब है आँखों में

        #श्वेता🍁

गुम होता बचपन

ज़िदगी की शोर में
गुम मासूमियत
बहुत ढ़ूँढ़ा पर
गलियों, मैदानों में
नज़र नहीं आयी,
अल्हड़ अदाएँ,
खिलखिलाती हंसी
जाने किस मोड़ पे
हाथ छोड़ गयी,
शरारतें वो बदमाशियाँ
जाने कहाँ मुँह मोड़ गयी,
सतरंगी ख्वाब आँखों के,
आईने की परछाईयाँ,
अज़नबी सी हो गयी,
जो खुशबू बिखेरते थे,
उड़ते तितलियों के परों पे,
सारा जहां पा जाते थे,
नन्हें नन्हें सपने,
जो रोते रोते मुस्कुराते थे,
बंद कमरों के ऊँची
चारदीवारी में कैद,
हसरतों और आशाओं का
बोझा लादे हुए,
बस भागे जा रहे है,
अंधाधुंध, सरपट
ज़िदगी की दौड़ में
शामिल होती मासूमियत,
सबको आसमां छूने की
जल्दबाजी है।

          #श्वेता🍁

Sunday, 23 April 2017

जीवन व्यर्थ नहीं हो सकता

हर रात नींद की क्यारी में
बोते है चंद बीज ख्वाब के
कुछ फूल बनकर मुस्कुराते है
कुछ दफ्न होकर रह जाते है
बनते बिगड़ते ज़िदगी के राह में
चंद सपनों के टूट जाने से
जीवन व्यर्थ नहीं हो सकता।

आस निराश के पंखो़ में उड़कर
पंछी ढ़ूढ़े बसेरा पेड़़ो से जुड़कर
कभी मिलती है छाँव सुखों की
धूप तेज लगती है दुखो की
हर दिन साँझ के रूठ जाने से
भोर का सूरज व्यर्थ नहीं हो सकता।

रोना धोना, रूठना मनाना
लड़ना झगड़ना बचपन सा जीवन
जिद में अड़ा कभी उदास खड़ा
खोने का डर पाने की हसरत
कभी बेवजह ही मुस्कुराता चला
मासूम ख्वाहिशों को हाथों मे लिये
चंद खिलौने के फूट जाने से
बचपन तो व्यर्थ नहीं हो सकता।

कुछ भी व्यर्थ नहीं जीवन में
हर बात में अर्थ को पा लो
चंद साँसों की मोहलत मिली है,
चाहो तो हर खुशी तुम पा लो
आँखों पे उम्मीद के दीये जलाकर
हर तम पे विजय तुम पा लो
कुछ गम के मिल जाने से
अर्थ जीवन का व्यर्थ नहीं हो सकता।

       #श्वेता🍁

Saturday, 22 April 2017

धरती बचाओ

जनम मरण का खेल तमाशा
सुख दुख विश्वास अविश्वास
प्रेम क्रोध सबका संगम है
कर्मभूमि सबके जीवन की
धरती माँ का यही अँचल है
नहीं किसी से करती  भेद
सबको देती एकसमान भेंट
रंग बिरंगे मौसम कण कण में
पल पल करवट लेते क्षण में
कहीं हरीतिमा कही रेतीला
कही पर्वत पर बर्फ का टीला
ऊँची घाटी विस्तृत बगान
सब सुंदर पृथ्वी की जान
कल कल बहती जलधारा है
विशाल समन्दर बड़ा खारा है
बर्फ से ढका हुआ ध्रुव सारा है
कहीं उगलता आग का गुब्बारा है
चहकते पंछी के कलरव नभ में
असंख्य विचित्र जीव है जग में
अद्वितीय अनुपम रचना पर मोहित
प्रभु के हृदय पर धरा सुशोभित

पर मौन धरा का रूदन अब
तुमको ही समझना होगा
जितना दुलार मिला है धरती से
उतना ही तुम्हें वापस देना होगा
हे मानव तुम्हें ही अपने हाथों से
धरा के विनाश को रोकना होगा
वृक्षों को नष्ट कर कंकरीट न बोओ
वरना भविष्य में तुमको रोना होगा
अमृत है जल जीवन के लिए
न बहाया करो कभी व्यर्थ में
फिर बूँद बूँद को तरसना होगा
सबसे पहला घर धरा है तुम्हारा
ये विनष्ट हुआ तो जीवन क्या होगा
अपने घर की हर संपदा को तुमको
अपने प्रयास से सहेजना होगा
सुनो विनाश के बढ़ते कदमों की चाप
जो निगल रहा है सबकुछ चुपचाप
अब भी वक्त है सचेत हो जाओ
धरा की तुम छतरी बन जाओ

धरोहर समेटो ।धरती बचाओ।जीवन बचाओ।

       #श्वेता🍁

           

Thursday, 20 April 2017

तुम साथ हो

मौन हृदय के स्पंदन के
सुगंध में खोये
जग के कोलाहल से परे
एक अनछुआ सा एहसास
सम्मोहित करता है
एक अनजानी कशिश
खींचती है अपनी ओर
एकान्त को भर देती है
महकती रोशनी से
और मैं विलीन हो जाती हूँ
शून्य में कहीं जहाँ
भावनाओं मे बहते
संवेदनाओं की मीठी सी
निर्झरी मन को तृप्त करने का
असफल प्रयास करती है,
उस प्रवाह में डूबती उतरती
भूलकर सबकुछ
तुम्हें महसूस करती हूँ
तब तुम पास हो कि दूर
फर्क नहीं पड़ता कोई
बस तुम साथ होते हो,
धड़कते दिल की तरह,
उस श्वास की तरह
जो अदृश्य होकर भी
जीवन का एहसास है।

            #श्वेता🍁

खुशबू आपकी

सुर्ख गुलाब की खुशबुएँ उतरने लगी
रूठी ज़िदगी फिर से अब सँवरने लगी

बाग में तितलियाँ फूलों को चूमे है जब
लेकर अँगड़ाईयाँ हर कली बिखरने लगी

एक टुकड़ा धूप जबसे आँगन मेरे उतरा
पलकों की नमी होंठों पे सिहरने लगी

दूर जाकर भी इन आँखों मे मुस्कुराते हो
दो पल के साथ को हसरतें तड़पने लगी

तुम मेरी ज़िदगी का हंसी किस्सा बन गये
एहसास को छूकर दीवानगी गुजरने लगी

       #श्वेता🍁


Wednesday, 19 April 2017

राधा की पीड़ा

न भाये कछु राग रंग,
न जिया लगे कछु काज सखि।

मोती टपके अँचरा भीगे,
बिन मौसम बरसात सखि।

सूना पनघट जमना चुप सी,
गोकुल की गली उदास सखि।

दिवस जलावै साँझ रूलावै,
बड़ी मुश्किल में कटे रात सखि।

बैरन निदियां भयी नयन से,
भरी भरी आये ये आँख सखि।

निर्मोही को संदेशा दे दो,
लगी दरश की प्यास सखि।

दिन दिन भर मैं बाट निहारूँ,
कब आयगे मोरे श्याम सखि।

   #श्वेता🍁


एक ख्याल

जेहन की पगडंडियों पर चलकर
ए ख्याल,मन के कोरो को छूता है।
बरसों से जमे हिमखंड
शब्दों की आँच में पिघलकर,
हृदय की सूखी नदी की जलधारा बन
किनारों पर फैलै बंजर धरा पर
बूँद बूँद बिखरकर नवप्राण से भर देती है,
फिर प्रस्फुटित होते है नन्हें नन्हें,
कोमल भाव में लिपटे पौधे,
और खिल जाते है नाजुक
डालियों पर महकते
मुस्कुराहटों के फूल,
सुवासित करते तन मन को।
ख्वाहिशों की तितलियाँ
जो उड़कर छेड़ती है मन के तारों को
और गीत के सुंदर बोल
भर देते है जीवन रागिनी
और फिर से जी उठती है,
प्रस्तर प्रतिमा की
स्पंदनविहीन धड़कनें।
एक ख्याल, जो बदल देता है
जीवन में खुशियों का मायना।

            #श्वेता🍁

सुरमई अंजन लगा

सुरमई अंजन लगा निकली निशा। चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।। सेज तारों की सजाकर  चाँद बैठा पाश में, सोमघट ताके नयन भी निसृत सुधा...