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Tuesday, 2 May 2017

शहीदों के लिए

कडी़ निंदा करने का अच्छा दस्तूर हो गया
कब समझोगे फिर से बेटा माँ से दूर हो गया

रोती बेवाओं का दर्द कोई न जान पाया
और वो पत्थरबाज देश में मशहूर हो गया

कागज़ पर बयानबाजी अब बंद भी करो तुम
माँगे है इंसाफ क्या वीरों का खूं फिजूल हो गया

सह रहे हो मुट्ठीभर भेड़ियों की मनमानी को
शेर ए हिंदुस्तान इतना कबसे मजबूर हो गया

दंड दो प्रतिशोध लो एक निर्णय तो अब कठोर लो
हुक्मरानों की नीति का हरजाना तो भरपूर हो गया

उपचार तो करना होगा इस दर्द बेहिसाब का
सीमा का जख्म पककर अब नासूर हो गया
 
         #श्वेता🍁


भोर.का सूरज

आसमान की अलगनी पे लटका
बादलों से नहाकर निकलता
नरम किरणों की बूँदे टपकाता
भोर का संजीवन लाता है सूरज

लुकाछिपी झुरमुटों से करता
चिड़ियों के परों पे उड़ता फिरता
नदियों के धारों के संग बहकर
समन्दर की लहरों में मचलता सूरज

धरा के कण कण को चूमता धूप से
बाग की कलियों को सहलाकर
पंखुड़ियों के रूख़सार पे ठहर के
नरम डालियों से लिपटता सूरज

लेकर उजाले की डिबिया हमेशा
भोर की पलकों पे सजाकर के जाता
रूत चाहे कोई हो नियत समय पर
खिड़की पे आके जगाता है सूरज

चाहे महल हो या हो झोपड़ी कोई
नहीं भेद करता कभी भी किसी से
उलट के किरणों से भरी टोकरी को
जग से अंधियारे को मिटाता है सूरज

       #श्वेता🍁