Thursday, 8 June 2017

अजनबी ही रहे

हम अजनबी ही रहे इतने मुलाकातों के बाद
न उतर सके दिल में कितनी मुलाकातों के बाद

चार दिन बस चाँदनी रही मेरे घर के आँगन में
तड़पती आहें बची अश्कों की बरसातों के बाद

है बहुत बेदर्द लम्हें जो जीने नहीं देते है सुकून से
बहुत बेरहम है सुबह गुजरी मेहरबां रातों के बाद

चाहा तो बेपनाह पर उनके दिल में न उतर सके
दामन मे बचे है कुछ आँसू चंद सवालातों के बाद

ऐ दिल,चल राह अपनी किस आसरे मे बैठा तू
रुकना मुनासिब नहीं लगता खोखली बातों के बाद

#श्वेता🍁

Wednesday, 7 June 2017

पुरानी डायरी

सालों बाद
आज हाथ आये
मेरी पुरानी डायरी के
खोये पन्ने,
फटी डायरी की
खुशबू से खोकर,
छूकर उंगलियों के
पोर से गुजरे वक्त को
जीने लगी उन
साँस लेते यादों को,
मेरी पहली कविता,
जिसके किनारे पर
काढ़ी थी मैंने
लाल स्याही से बेलबूटे,
जाने किन ख्याल़ो में बुनी
आड़ी तिरछी लकीरें
उलझी हुयी अल्पनाएँ
जाने किन मीठी
कल्पनाओं में लिखे गये
नाम के पहले अक्षर,
सखियों की खिलखिलाते
हंसी में मुस्कुराते कार्टून,
मेंहदी के नमूने,
नयी नयी रसोई बनाने
की उत्साह में लिखे गये
संजीव कपूर शो के व्यंजन
कुछ कुछ अस्पष्ट
टेलीफोन के नम्बर
कुछ पन्नों पे धुँधले शब्द
जिस पर गिरे थे
मेरे एहसास के मोती,
अल्हड़,मादक ,यौवन
की सपनीली अगड़ाईयाँ,
बचकाने शब्दों में अभिव्यक्त,
चाँद, फूल,और परियों की
आधी अधूरी कहानियाँ
कुछ सूखे गुलाब की पंखुड़ियाँ
दो रूपये के नये नोट का
अनमोल उपहार,
जिसे कभी माँ ने दिया था
जिसका चटख गुलाबी
अब फीका हो गया था,
दम तोड़ते पीले पन्नों पर
लिखे मेरी भावनाओं
के बेशकीती धरोहर
जिसके सूखे गुलाब
महक रहे है
गीली पलकों पे समेटकर
यादें सहेजकर रख दिया
अपनी गुलाबी दुपट्टे में
लपेटकर,फुरसत के पलों
में फीके पन्नों में
गुजरे वक्त की चमकीली
तस्वीर देखने को।

         #श्वेता🍁

Tuesday, 6 June 2017

पहली फुहार


तपती धरा के आँगन में
उमड़ घुमड़ कर छाये मेघ
दग्ध तनमन के प्रांगण में
शीतल छाँव ले आये मेघ
हवा होकर मतवारी चली
बिजलियो की कटारी चली
लगी टपकने अमृत धारा
बादल के मलमली दुपट्टे
बरसाये अपना प्रथम प्यार
इतर की बोतलें सब बेकार
लगी महकने मिट्टी सोंधी
नाचे मयूर नील पंख पसार
थिरक बूदों के ताल ज्यों पड़ी
खिली गुलाब की हँसती कली
पत्तों की खुली जुल्फें बिखरी
सरित की सूखी पलकें निखरी
पसरी हथेलियाँ भरती बूँदें
करे अठखेलियाँ बचपन कूदे
मौन हो मुस्काये मंद स्मित धरा
बादल के हिय अमित प्रेम भरा
प्रथम फुहार की लेकर सौगात
रूनझुन बूँदे पहने आ रही बरसात


        #श्वेता🍁


Saturday, 3 June 2017

एक रात ख्वाब भरी

गीले चाँद की परछाई
खोल कर बंद झरोखे
चुपके से सिरहाने
आकर बैठ गयी
करवटों की बेचैनी
से रात जाग गयी
चाँदनी के धागों में
बँधे सितारे
बादलों में तैरने लगे
हवा लेकर आ गयी
रातरानी की खुशबू में
लिपटे तेरे ख्याल
हवाओं की थपकियाँ देकर
आगोश में लेकर सुलाने लगे
मदभरी पलकों को चूमकर
ख्वाबों की परियाँ
छिड़क कर
तुम्हारे एहसास का इत्र
पकड़ कर दामन
खींच रही है स्वप्निल संसार में

       #श्वेता🍁






तेरा रूठना


तन्हा हर लम्हें में यादों को खोलना,
धीमे से ज़ेहन की गलियों में बोलना।

ओढ़ के मगन दिल प्रीत की चुनरिया
बाँधी है आँचल से नेह की गठरिया,
बहके मलंग मन खाया है भंग कोई
चढ़ गया तन पर फागुन का रंग कोई,
हिय के हिंडोले में साजन संग डोलना
धीमे से ज़ेहन की गलियों में बोलना।

रेशम सी चाहत के धागों का टूटना
पलकों के कोरों से अश्कों का फूटना,
दिन दिनभर आँखों से दर को टटोलना
गिन गिनकर दामन में लम्हें बटोरना,
पूछे है धड़कन क्यों बोले न ढोलना
धीमे से ज़ेहन की गलियों में बोलना।

रूठा है जबसे तू कलियाँ उदास है
भँवरें न बोले तितलियों का संन्यास है,
सूनी है रात बहुत चंदा के मौन से
गीली है पलकें ख्वाब देखेगी कौन से,
बातें है दिल की तू लफ्ज़ो से तोल ना
धीमे से ज़ेहन की गलियों में बोलना।
               #श्वेता🍁

सुरमई अंजन लगा

सुरमई अंजन लगा निकली निशा। चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।। सेज तारों की सजाकर  चाँद बैठा पाश में, सोमघट ताके नयन भी निसृत सुधा...

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