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Saturday, 3 June 2017

एक रात ख्वाब भरी

गीले चाँद की परछाई
खोल कर बंद झरोखे
चुपके से सिरहाने
आकर बैठ गयी
करवटों की बेचैनी
से रात जाग गयी
चाँदनी के धागों में
बँधे सितारे
बादलों में तैरने लगे
हवा लेकर आ गयी
रातरानी की खुशबू में
लिपटे तेरे ख्याल
हवाओं की थपकियाँ देकर
आगोश में लेकर सुलाने लगे
मदभरी पलकों को चूमकर
ख्वाबों की परियाँ
छिड़क कर
तुम्हारे एहसास का इत्र
पकड़ कर दामन
खींच रही है स्वप्न संसार में

       #श्वेता🍁






तेरा रूठना

हँसते हँसते चुपके से पलकों को पोंछना
दिन दिन भर आँखों से दर को टटोलना
न सहा जाये है तेरा कुछ भी न बोलना

सज़ा की वज़ह भी बता जाते तुम
ख़ता क्या हुई हमसे गिना जाते तुम
बेचैन बहुत कर रहा है तेरा यूँ रूठना
बसके मेरे  दिल में फिर टुकडो़ में टूटना
सुनो खल रहा है तेरा हमको न टोकना
न सहा जाय है तेरा कुछ भी न बोलना

किस रंगरेज़ से रँगवाई है चुनरिया
ओढ़ के मगन दिल प्रीत की चुनरिया
बहके मलंग मन खाया है भंग कोई
चढ़ गया तन पे फागुन का रंग कोई
मुस्का आँखों से दिल से राज़ खोलना
न सहा जाय है तेरा कुछ भी न बोलना

रूठा है जबसे तू हर कली उदास है
बोले न भँवरें तितली आती न पास है
सूनी है रात बहुत चंदा के मौन से
गीली है पलकें ख्वाब देखे अब कौन से
बातें है दिल की तू लफ्ज़ो से तोल ना
न सहा जाय है तेरा कुछ भी न बोलना

               #श्वेता🍁