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Tuesday, 20 June 2017

सुखद स्वप्न

चोटिल होकर यथार्थ के धरा से
बोझिल मन जब नीर बहाता है
टूट टूट कर टुकड़ोंं में जीवन का
जब सब सार समझ में आता है
बेकल मन क्षण दो क्षण के लिए
बेसुध सुधबुध भूलना चाहता है
उस विश्राम के पल में थका मन
पकड़ के कुछ यादों की डोरी
सुखद स्वप्न लोक में ले जाता है

गुलाब लदी डालियों के कंटक
भीनी सुगंध से मन भरमाते है
तितली सा उड़  मन को छूकर
अधरों को चूम रागिनी गाते है
पतझड़ न आया हो जहाँ कभी
बहार ही बहार की सौगातेंं है
उर स्पंदित हो जाता क्षण में
पकड़ उँगलियाँ भँवर प्रेम के
सुखद स्वप्न लोक में ले जाता है

अंधेरे मन के आँगन में टूटकर
चाँद कोने कोने में भर जाता है
तारें लेकर दीपक मन मुंडेर पे
निःशब्द टिमटिम मुस्काते है
जीवन से चुरा समय के पन्ने
सुनहरी कविताएँ रचते जाते है
तोड़ के बंधन सारे रस्मों के
अतुल नेह के फेरे लग जाते है
क्षणभंगुर ही सही पर मनचाहे
साथ की कल्पना में उड़कर मन
सुखद स्वप्न लोक ले जाता है।

      #श्वेता🍁

चुपके से

चुपके से उतरे दिल में हंसी लम्हात दे गये
पलकें अभी भी है भरी वो  बरसात दे गये

भर लिए ख्वाब आँखों मे न पूछा तुमसे
चंद यादों के बदले दर्द  की सौगात दे गये

एक नज़र प्यार की चाहत ज्यादा तो न थी
खामोश रहे  तुम उलझे से ख्यालात दे गये

दिल मे गहरे चढ गये रंग तेरे  एहसासों के
मिटाए से न मिटे महकते से जज़्बात दे गये

हसरते दिल की अधूरी है न पूरी होगी कभी
गर्म आहों में लिपटी तन्हा सर्द  रात दे गये

    #श्वेता🍁