Search This Blog

Sunday, 2 July 2017

रात के तीसरे पहर

सुरमई रात के उदास चेहरे पे
कजरारे आसमां की आँखों से
टपकती है लड़ियाँ बूँदों की
झरोखे पे दस्तक देकर
जगाती है रात के तीसरे पहर
मिचमिचाती पीली रोशनी में
थिकरती बरखा घुँघरू सी
सुनसान राहों से लगे किनारों पे
हलचल मचाती है बहती नहर
पीपल में दुबके होगे परिंदें
कैसे रहते होगे तिनकों के घर में
खामोश दरख्तों के बाहों में सोये
अलसाये है या डरे किसको खबर
झोंका पवन का ले आया नमी
छू रहा जुल्फों को हौले हौले
चूमकर चेहरे को सिहराये है तन
पूछता हाल दिल का रह रह के
सिलवटें करवटों की बेचैनी में
बीते है  रात की तीसरी पहर

    #श्वेता🍁

चुप है

बड़ी खामोशी है फैली ये हवाएँ चुप है
तेरे दर होके लौटी आज सदाएँ चुप है

तक रहे राह तेरी अब सुबह से शाम हुई
तेरीे आहट नहीं मिलती ये दिशाएँ चुप है

भरे है बादल ये आसमां बोझिल सा लगे
बरस भी जाती नही क्यों ये घटाएँ चुप है

हरे भरे गुलिस्तां में छायी है वीरानी कैसी
मुस्कुराने की वजह तुम हो फिजा़एँ चुप है

सिवा तुम्हारे न कुछ और रब से चाहा है
बिखरी है आरजू सारी ये दुआएँ चुप है
 
    #श्वेता🍁