Search This Blog

Tuesday, 11 July 2017

रक्तपिपासु

क्यूँ झकझोरती नहीं आत्मा
रक्त पिपासु बन बैठे है
क्यूँ हृदयविहीन है इंसां
ये कैसा जेहाद बता न
किस धर्म में लिखा है घात बता
रक्त सने तन मन नराधम
बलि चढ़ाते मासूमों की
कर कैसे मुँह तक ले जाकर
अन्न के निवाले खातेे होगे
कैसे रातों को चैन से
नेपथ्य में गूँजते चीखों को
अनदेखा कर स्वप्न सुनहरे आते होगे
इंसान नही नरभक्षी है जो
इंसानों को खाते है
अधम अधोगति ज्ञात नही
जो मानुष का भोग लगाते है
दंड तो अवश्य संभावित है
आज मिले कि कल हो विनाश
नियम प्रकृति का याद रहे सुनो
कर्म यही भोगकर जाना.होगा
जो तुमने किया धर्म के नामपर
सब कर्ज यही चुकाना होगा
न समझो कमज़ोरी इसको
हमारी भलमानसता है ये
हम जिस दिन हुँकार भरेगे
शिव का रौद्र रूप धरेगे
भस्म हो जायेगा अस्तित्व तुम्हारा
याद रखना ओ जेहाद के ठेकेदारों




आराम कमाने निकलते है

आराम कमाने निकलते है आराम छोड़कर
जेब में रखते है मुट्ठीभर ख्वाहिश मोड़कर
दो निवाले भी मुश्किल हो जाते है सुकून से
कल की चिंता रख दे हर कदम झकझोर कर
टूटी गुल्लकों के साथ उम्मीद भरी आँखें मासूम
पापा हमें भी ला दो खिलौने और मिठाई मोलकर
रुपयों का मोल हर बार ज्यादा लगा दुकान पर
हर खुशी कम लगी जब देखी जेबे टटोलकर
कहते है सब खरीदा नही जा सकता है दाम देकर
कुछ भी न मिला भरे बाज़ार मे मीठे से बोलकर
अजीब है जिंंदगी ऊसूल भी गज़ब से लगते है
सिलसिला साँसों का टूट जायेगा यूँ ही भागदौड़ कर