Tuesday, 25 July 2017

सावन-हायकु


छेड़ने राग
बूँदों से बहकाने
आया सावन

खिली कलियाँ
खुशबु हवाओं की
बताने लगी

मेंहदी रचे
महके तन मन
मदमाये है

हरी चुड़ियाँ
खनकी कलाई में
पी मन भाए

धानी चुनरी
सरकी रे सर से
कैसे सँभालूँ

झूला लगाओ
पीपल की डार पे
सखियों आओ

लजीली आँखें
झुक झुक जाये रे
धड़के जिया

मौन अधर
मंद मुस्काये सुन
तेरी बतिया

छुपके ताके
पलकों की ओट से
तोरी अँखियाँ

संग भीग ले
रिम झिम सावन
बीत न जाए



Monday, 24 July 2017

बिन तेरे सावन

जाओ न 
सताओ 
न बरसाओ फुहार
साजन बिन
क्या सावन
बरखा बहार
पर्वतों को 
छुपाकर 
आँचल में अपने
अंबर से 
धरा तक 
बादल बने कहार
पिया पिया बोले
हिय बेकल हो डोले 
मन पपीहरा
तुमको बुलाये बार बार
भीगे पवन झकोरे 
छू छू के मुस्काये
बिन तेरे 
मौसम का 
चढ़ता नहीं खुमार
सीले मन 
आँगन में
सूखे नयना मोरे
टाँक दी पलकें 
दरवाजे पे 
है तेरा इंतज़ार
बाबरे मन की 
ठंडी साँसें
सुलगे गीली लड़की
धुँआ धुँआ 
जले करेजा
कैसे आये करार

    #श्वेता🍁

*चित्र साभार गूगल*

Saturday, 22 July 2017

धूप की कतरनें

छलछलाए आसमां की आँखों से
बरसती बैचेन बूँदें
देने लगी मन की खिड़की पर दस्तक
कस कर बंद कर ली ,फिर भी,
डूबने लगी भीतर ही भीतर पलकें,
धुँधलाने लगे दृश्य पटल
हृदय के चौखट पर बनी अल्पना में
मिल गयी रंगहीन बूँदे,
भर आये मन लबालब
नेह सरित तट तोड़ कर लगी मचलने,
मौन के अधरों की सिसकियाँ
शब्दों के वीरान गलियारे में फिसले,
भावों के तेज झकोरे से
छटपटा कर खुली स्मृतियों के पिटारे,
झिलमिलाती बूँदों मे
बहने लगी गीली हवाओं की साँसे,
अनकहे सारे एहसास
दुलराकर नरम बाहों से आ लिपटे,
सलेटी बादलों के छाँव में
बड़ी दूर तक पसरे नहीं गुजरते लम्हें,
बारिश से पसीजते पल
ढ़ूँढ रहे चंद टुकड़े धूप की कतरनें।

    #श्वेता🍁


Friday, 21 July 2017

आहटें

दिन के माथे पर बिखर गयी साँझ की लटें
स्याह आसमां के चेहरे से नज़रे ही न हटें

रात के परों पे उड़ती तितलियाँ जुगनू की
अलसाता चाँद बादलों में लेने लगा करवटें

फिसलती चाँदनी हँसी फूलों के आँचल पर
निकले टोलियों में सितारों की लगी जमघटें

पूछ रही हवाएँ छूकर पत्तों के रूखसारों को
क्यों खामोश हो लबों पे कैसी है सिलवटें

सोये झील के आँगन में लगा है दर्पण कोई
देख के मुखड़ा आसमां सँवारे बादल की लटें

चुपके से हटाकर ख्वाबों के अन्धेरे परदे
सुगबुगाने लगी नीदें गुनगुनाने लगी आहटे

    #श्वेता🍁

हे, अतिथि तुम कब जाओगे??

जलती धरा पर छनकती
पानी की बूँदें बुदबुदाने लगी,
आस से ताकती घनविहीन
आसमां को ,
पनीली पीली आँखें
अब हरी हो जाने लगी ,
बरखा से पहले उमस ,तपन
से बेहाल कण कण में
बारिश की कल्पना भर से ही
घुलने लगती थी सूखी जीभ पर
चम्मच भर शहद सी
स्वागत गीत गाते उल्लासित हृदय
दो चार दिन में सोंधी खुशबू
माटी की सूरत बदल गयी,
भुरभुरी होकर धँसती
फिसलन भरे किचकिच रास्तों में,
डबडबाने लगी है सीमेंट की दीवारें
पसीजने को आतुर है पत्थरीले छत,
खुद को बचाता घर अचानक
उफनते नदी के मुहाने पर आ गया हो
दरारों से भीतर आती
छलनी छतों से टपकती बूँदों को
कटोरे ,डेगची मगों में
भरने का असफल प्रयास करते
एक कोने में सिमटे
बुझे चूल्हे में भरते पानी को देखते
कल की चिंता से अधमरे
सोच रहे है चिंतित,
बरखा रानी और कितना सताओगी
त्रस्त दुखित हृदय पूछते है
हे, अतिथि तुम कब जाओगे??

     #श्वेता🍁

Wednesday, 19 July 2017

ख्यालों का चूल्हा


जगे मन के अनगिनत
परतों के नीचे
जलता रहता है
अनवरत ख्यालों का चूल्हा
जिसपर बनते है
पके ,अधपके,नमकीन,
मीठे,तीखे ,चटपटे ,जले
बिगड़े ,अधकच्चे  व्यंजन,
जिससे पल पल
बदलता रहता है मिज़ाज
और मिलता रहता है
हर बार एक नया स्वाद
ज़िदगी को।
ख्यालों की भट्टी के धीमी
आँच पर
सुलगते है
कोमल एहसास और
असंख्य ज़ज़्बात के पन्ने
और उनके सुनहरे
लपटों में सेेके जाते है
चाश्नी से रिश्तें एतिहात से
बनी रहे मिठास
जिंदगी की कडुवाहटों के थाली मे।
न बुझने दीजिए
ख्यालों के सोंधे चूल्हें
बार बार नये हसरतों
की लकडी डालकर
आँच जलाये रहिये
ताकि फैलती रहे नये
पकवानों की खुशबू
और बढ़ती रहे भूख
जि़दगी को एक एक टुकड़ा चखने की।
    #श्वेता🍁

*चित्र साभार गूगल*

सुरमई अंजन लगा

सुरमई अंजन लगा निकली निशा। चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।। सेज तारों की सजाकर  चाँद बैठा पाश में, सोमघट ताके नयन भी निसृत सुधा...