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Thursday, 27 July 2017

मौन शाम

पत्थर के बने सतह पर
लाजवन्ति के गमले के झाड़़ के पीछे
एक हाथ अपने गालों पर टिकाये
पश्चिमी आसमां के बदलते रंग में
अनगिनत कल्पनाओं में विलीन
निःशब्द मौन साँझ की दस्तक सुनती मैं
पीपल के ऊपरी शाखों से फिसलकर
मेरे चेहरे और बालों तक
पहुँचकर मुझे छूने का असफल प्रयास करती
बादलों के बाहों में छुपकर
मुझे निहारती एकटुक वो गुलाबी किरणें
धीरे धीरे बादलों की लहरों में डूब गयी
आसमां से निकलकर
बिखर गया एक अजब सा मौन
छुपी किरणें बादलों के साथ मिलकर
बनाने लगी अनगिनत आकृतियां
गुलाबी पगड़डियाँ,पर्वतों से निकलते
भूरे झरने, सूखे बंजर सफेद खेत
सिंदुरी समन्दर
हल्के बैगनी बादल खोलने लगे
मन के स्याह पिटारों को
सुर्ख मलमल पर सोयी
फड़फड़ाने लगी सुनहरी तितलियाँ
और निकलकर बैठ गयी
मौन शाम के झिलमिलाते मुंडेरों पर
साथ रहने मेरे उदास मन में,
स्याह साँझ में चमकीले रंग घोलने
सुवासित करने चम्पा की महक
तन मन घर आँगन को जगमगाने
मौन साँझ में खिलखिलाने ।

#श्वेता🍁